फिर एक बार छत से दोस्ती कर रही हूँ मैं।
फिर एक बार छत की सीढ़ियाँ चढ़ रही हूँ मैं।
बचपन में उससे बड़ा याराना था,
छत तक मेरा बहुत आना-जाना था।
जाड़ों की दोपहर गुज़ारी उसकी गोद में,
गर्मियों की शामें बीती वहीं मोद में,
लिट्टियों संग सेंकी यारियाँ अलाव में,
अंधेरी रातों में झूमा किये पुरवाई के बहाव में।
खो-खो, कबड्डी में तब रमे रहा करते थे,
पतंगों की डोरों पर भाव उड़ा करते थे।
सुखाये वहाँ कपड़े, कभी पापड़ और अचार,
वहीं बैठ सीखे सु-आचरण, सुविचार।
सितारों के सपने लेट कर देखे जहाँ,
जड़ों से जुड़े रहना भी तो सीखा वहाँ।
साँझी बातें, साँझे चूल्हे, साँझा जहाँ मन था,
सादे रिश्ते, गाढ़ी ख़ुशी, सादा-सरल जीवन था।
सीढ़ियाँ चढ़ते गए, मालूम ही नहीं हुआ,
बचपन का मेरा दोस्त कब किस मोड़ पर बिछड़ गया।
वक़्त अब निकाल कर मिलने मैं उससे जा रही हूँ,
बिछड़े हुए उस दोस्त को फिर से मैं मना रही हूँ।
वक़्त का असर अलग-अलग दोनों पर हुआ है,
साँसें मेरी फूलती है, छत बड़ा नया-नया है।
बाँहों में अब भरता हमें अलग सा आकाश है,
मिलने की है ख़ुशी भी, कुछ खोने का भी एहसास है।
पर सितारे हैं वहीं जिनसे कभी सपने कहे,
आज मेरी बेटी के सपनों को वो हैं सुन रहे,
बचपन की वो कहानियाँ बेटी को मैं सुना रही हूँ,
छत से हौले-हौले उसकी भी दोस्ती करा रही हूँ ।