परेशान हो तुम?

क़ैद सी लगने लगी है ज़िन्दगी?

बंद हो गए हो अपने घरों में;

बालकनी से थोड़ा ही देख पाते हो –

थोड़ा सा आसमान, थोड़ी ज़मीन।

राशन से भरी रसोई भी

रास नहीं आ रही तुमको।

परिवार के साथ हो

तो परस्पर बातचीत से परेशां हो,

अकेले हो तो उत्कंठा और

अकेलापन खा रहा है तुम्हें?

कुछ दिनों की बात है तुम्हारे लिए

फिर भी चिंता नहीं छूटती तुमसे।

कुछ दिन की छुट्टी है तुम्हारे लिए –

कर लो कुछ आराम

जिसे कब से ढूंढते थे।

फिर तुम बाहर जा पाओगे।

वो रेस्तरां, वही दफ़्तर, वो जलसे –

वही हो जाएगी तुम्हारी ज़िन्दगी।

ज़िन्दगी में जद्दो-जहद न मिली तुम्हें,

फिर भी परेशां हो?

समय है तुम्हारे पास,

सो सोचना तुम उसके लिए

जो रोज़ कमाकर रोज़ खिलाता है।

ये कुछ दिन उस पर कैसे बीतेंगे?

वो, जो तुम्हारे घर की सफाई करती थी,

वो, जो तुम्हारे लिए खाना बनाती थी ,

वो, जो रोज़ अपनी ऑटो में, रिक्शे में

तुम्हें तुम्हारे सफ़र पर ले जाता था।

वो, जिससे भाजी अब नहीं ख़रीदते तुम,

वो, जो लोकल ट्रेन में सुबह-शाम

गुड़-अदरक की गोली बेचती थी।

उनके घर का राशन जाने कब ख़त्म हो जाये,

उनके बच्चे भूख से बिलबिलायें,

पर वो शायद उनका पेट न भर पायें।

शायद उसकी बूढ़ी माँ

इस लॉकडाउन के उस पार न मिल पाए।

उनके घर कोई सिक्योरिटी नहीं हैं,

न सैनिटाइज़र की बोतलें।

शायद पानी की भी क़िल्लत हो –

हर तीन घंटे साबुन से हाथ धोना पाना भी

विलास हो उनके लिए।

जब ऊब कर परेशां से बैठो

अपनी ठंडी, हरी बालकनी में,

तो सोचना तुम,

कि उस ग़रीब की भूख कैसे मिटाओगे।

जब सब कुछ सामान्य हो जायेगा तुम्हारे लिए

तो उनकी ज़िन्दगी को सामान्य कैसे बनाओगे?