पतझड़ तो ठीक था।
पत्तों के सूख कर गिर जाने को,
प्रकृति का नियम मान चुके थे हम।
पर अब तो शनैः शनैः
वो दरख़्त गिर रहे हैं,
जिनकी ओट में
बचपन सहेज रखा था मैंने।
दूर ही सही,
काल्पनिक उस दुनिया में
सुरक्षित था, मनोहर और
बेपरवाह कोई अस्तित्व मेरा।
और थी अनकही एक आशा भी –
कि लौट पाउँगी कभी
सुरम्य उस जीवन में मैं।
एक-एक जड़ मेरी उस कल्पना की,
धीरे-धीरे सूखती ही जा रही है।
जिन तनों पर झूलती थी
अल्हड़ मेरी बचपन की यादें;
फल लदे जिन तनों से
आनंद पूरित रस पिया था;
एक-एक कर वो तने
मिट्टी में मिलते जा रहे हैं।
टुकड़ा-टुकड़ा, साथ उनके,
मैं भी तो मिट्टी में मिलती जा रही हूँ ।