मेरा जन्म नहीं हुआ वहाँ,
पर जन्मभूमि है वो;
मेरे विचारों की,
संस्कारों की,
व्यक्तित्व की,
अस्तित्व की।

मेरे पुरखे सदियों पहले
आकर बस गए जहाँ ।
क्षितिज जिसका हिमालय।
नसों में बहता है जहाँ कोसी का पानी ।
उसी धरती पर धाम मेरा –
तारटोला।

वहाँ जैसे मैं राजकुमारी थी।
पूरे गाँव की दुलारी थी।
सबके सपनों से, आशीष से ही
शायद पंख मिले मुझे ।
महसूस करती हूँ अब भी
कंधों पर उनकी ज़िम्मेदारी सी।

परिवार मेरा, जड़ें मेरी,
वो धान और पटुए के खेत मेरे,
वो आम के, सुपारी के पेड़ मेरे।
बचपन की छुट्टियाँ मेरी;
और आज का युटोपिया मेरा –
वो है तारटोला।

और वो भी है तारटोला;
सुनसान, बियाबान,
थकी आँखों से जो
बाट देख रहा है अपने बाशिंदों की;
झुंड-झुंड निकल गए जो
आमदनी की, ज़िंदगी की खोज में ।

अख़बारों में छप रही है
आज जिनकी कहानी।
इंतज़ार में उनके परेशान हैं
हल को तरसती धरती, आम के बौर;
कई प्रश्न लिए, मँझधार में
वो मेरा तारटोला