तुम सरिता
तुम अल्हड़, तुम चंचल
बहती जाती हो अपनी रौ में
तुम उच्च्छृंखल।
बेबाक़ हो। बिंदास हो।
जाना नहीं है
तुमने कोई भी छल।
चली सदा हो अपने पथ ही,
अपने निमित्त को तुम।
कोई भी हो संकट, कंकड़,
तुम बहती चलती हो –
मुड़ कर कभी तोड़ कर –
कठिनाई का हल कर।
राह तुम्हारे देखो
कैसी हरियाली है;
दूब, पुष्प,
और वृक्ष वो फलदार।
तुमने ही तो सींचा उनको –
तुमसे ही तो पृथ्वी विपुल है।
और देखो वो सागर विस्तृत-
तुम ही तो हो प्राण सगर की!
तुम ने ही है स्नेह उंडेला,
लाई हो माधुर्य लवण में।
तुम हो सरिता
तुम हो चंचल
बहती जाना अपनी रौ में
तुम उच्च्छृंखल।