Gunjan Saxena after effect:

उम्र के हर मोड़ पर
मिली जब भी तुमसे
पाया वहीं तुमको –
जहाँ पहली बार मिले थे हम –
बचपन और यौवन की दहलीज़ पर।

सब कुछ खरा था वहाँ –
संभावनाओं की उस उर्वर ज़मीन पर –
हमारे झिलमिल सपने बेझिझक उपजते थे जहाँ।
उन सपनों को रोपते, सींचते, कहीं बदल गई मैं
पर गगन को चूम कर भी तुम रही वही।

वही शांत संकल्प, वही मासूमियत,
वही जोश, वही जज़्बा, वही ज़िद;
वही जुनून, वही निष्ठा, वही प्यार भी।
वही ढीठ सपनों की चाहत भी,
वही जीत जाने की हिम्मत भी।

कैसे परिभाषित करूँ तुमको?
शब्दों की सीमाओं को तुमने कब जाना?
मानस के अवरोध को तुमने कब माना?
तुमने तो बस एक माना अपने लक्ष्य को,
तुमने बस जाना कि हौसले से हासिल सब है।

ऊँचाइयों की उन्मुक्त उड़ान हो तुम।
स्वयं की बनाई पहचान हो तुम।
तूलिका की रंगीन बारीकियाँ भी हो,
ज्वालामुखी की उफनती ज्वाला भी,
अनवरत करघा चलाता सपनों का जुलाहा भी।

बेबाक़ हो, बेफ़िक्र भी,
जीवन की कटुता से, जटिलता से अनछुई सी;
निर्भीक, निश्चिंत, स्पष्ट, सहज।
ओज जो भुला दे तनाव और दबाव सारे –
कल्पना और यथार्थ का अभिसार हो तुम।

कालयंत्र हो शायद,
कि जब भी मिलती हूँ तुमसे,
वहीं पहुँच जाती हूँ फिर से –
जहाँ पहली बार मिले थे हम –
बचपन और यौवन की दहलीज़ पर ।